खुद को मैं ढूँढूँ, मैं खुद को तलाशूँ,
अंधेरों से लड़कर, उजाले को पाऊँ।
मेरे दिल के कोने में कितना मैं झाँकूँ,
जब खुद अपने भीतर ही सागर को पाऊँ।
जहाँ साँस भी कहे – "तू खुद ही जहाँ है",
जहाँ मन ये जाने – "तू ही दिव्य गगन है"।
न कोई दूरी रहे, न कोई राह अधूरी,
अंतर में ही छुपी है अमर ज्योति पूरी।
खो मत जगत में, भ्रम के जाल में,
तेरा आत्मस्वर गूँजे खुद्द के ख्याल में।
खुद की तलाश में मिलती है वो शांति,
जो मिटा दे हर पीड़ा, हर विकल भ्रांति।
खुद को मैं ढूँढूँ, मैं खुद को तलाशूँ,
अपनी ही रूह में परमात्मा को पाऊँ।
-एक साहित्यप्रेमी
#विद्यार्थीमित्र प्रा.रफीक शेख
The Spirit of Zindagi Foundation
🎓 डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम विद्यार्थी फाउंडेशन, परभणी.
https://www.vidhyarthimitra.com
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